डोंगरगढ़। वर्तमान परिवेश में बच्चों की परवरिश को लेकर अभिभावकों को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। आज माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर से बेहतर सुविधाएं देने की होड़ में कई बार उनकी हर उचित-अनुचित मांग और जिद को बिना सोचे-समझे पूरा कर देते हैं। उन्हें लगता है कि बच्चे की हर इच्छा पूरी करना ही प्रेम है, जबकि वास्तविकता यह है कि बच्चों का भविष्य सुविधाओं और दिखावे से नहीं, बल्कि संस्कार, अनुशासन, संवाद और सही दिशा से बनता है।
विवेक मोनू भंडारी ने कहा कि माता-पिता को सबसे पहले स्वयं यह समझना होगा कि वे अपने बच्चों के सामने किस प्रकार का आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं। बच्चा माता-पिता की कही हुई बातों से जितना सीखता है, उससे कहीं अधिक उनके व्यवहार को देखकर सीखता है। यदि माता-पिता बड़ों का सम्मान करेंगे, परिवार में मर्यादित व्यवहार करेंगे, संयम रखेंगे, मेहनत और ईमानदारी को महत्व देंगे तो बच्चे भी इन्हीं मूल्यों को अपने जीवन में उतारेंगे। इसलिए बच्चों को संस्कार देने से पहले माता-पिता को स्वयं अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।
उन्होंने कहा कि आज भागदौड़ भरी जिंदगी में माता-पिता के पास बच्चों के साथ बैठने, उनसे बात करने और उनकी भावनाओं को समझने का समय कम होता जा रहा है। कई बार बच्चे कुछ मांगते हैं तो उन्हें समझाने और समय देने के बजाय उनकी मांग तुरंत पूरी कर दी जाती है। यह सोच धीरे-धीरे बच्चों में हर इच्छा तत्काल पूरी होने की आदत पैदा कर सकती है। कभी-कभी माता-पिता का प्यार भरा “नहीं” बच्चे के भविष्य के लिए हजार “हां” से अधिक महत्वपूर्ण होता है।
विवेक मोनू भंडारी ने कहा कि हमारी सनातनी परंपरा में घर को मंदिर कहा जाता था। इसके पीछे केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि परिवार और समाज को संस्कार देने की एक मजबूत व्यवस्था थी। घर में बड़ों का सम्मान, छोटों के प्रति स्नेह, बातचीत में मर्यादा, व्यवहार में अनुशासन और परिवार के प्रत्येक सदस्य के प्रति जिम्मेदारी का भाव होता था। बच्चे अपने माता-पिता और बुजुर्गों के व्यवहार को देखकर ही जीवन के संस्कार सीखते थे। घर वास्तव में बच्चे की पहली पाठशाला और माता-पिता उसके पहले शिक्षक होते थे।
उन्होंने कहा कि आधुनिकता और तकनीक को अपनाना समय की आवश्यकता है, लेकिन आधुनिक जीवनशैली के नाम पर अपनी पारिवारिक मर्यादा, संस्कार और संस्कृति को भूल जाना उचित नहीं है। पश्चिमी सभ्यता की अच्छी बातों को अपनाया जा सकता है, लेकिन अपनी जड़ों और सनातनी मूल्यों से दूरी बनाकर बच्चों को संस्कार देने की अपेक्षा करना विरोधाभासी है। जब माता-पिता स्वयं अपने पारिवारिक मूल्यों और मर्यादाओं से दूर होते जाएंगे तो आने वाली पीढ़ी को संस्कार कौन देगा?
अच्छी शिक्षा के माया जाल में हम बच्चो को उचित संसाधन होने के बावजूद भी दिखावे के चक्कर मे छोटी उम्र में ही मेट्रो सिटी के हास्टल में भेज देते है सिर्फ बच्चो के भविष्य और समाज की देखा सीखी में हम गलत पे गलत फैसले लिए जा रहे है हमे समझना होगा,पूर्व काल मे बच्चो का हर निर्णय माता पिता लेते थे और घर की मर्यादा होती थी उसे बच्चो को स्वीकारना होता था आज हम बच्चो का निर्णय बच्चो से पूछकर लेना और मानना प्रेम समझने लगे है वह कितना उचित है अभिभावकों खुद समझना होगा।
उन्होंने कहा कि बच्चों को महंगी सुविधाएं देने से पहले उन्हें अपना समय देना जरूरी है। उनके साथ बैठकर बातचीत करना, उनकी बात सुनना, उनकी समस्याओं को समझना और उचित-अनुचित का अंतर बताना माता-पिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। बच्चे को यह समझना चाहिए कि हर इच्छा पूरी होना उसका अधिकार नहीं है, हर जिद सही नहीं होती और जीवन में कुछ पाने के लिए मेहनत, धैर्य और इंतजार भी करना पड़ता है।
विवेक मोनू भंडारी ने कहा कि आज माता-पिता अपने बच्चों के लिए केवल अच्छी शिक्षा और संपत्ति की विरासत छोड़ने के बजाय अच्छे संस्कारों की विरासत छोड़ने का प्रयास करें। क्योंकि संपत्ति कम-ज्यादा हो सकती है, सुविधाएं समाप्त हो सकती हैं, लेकिन अच्छे संस्कार जीवनभर बच्चे के साथ रहते हैं। आने वाली पीढ़ी हमारे आज के व्यवहार से तैयार होगी। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे जिम्मेदार, संस्कारी और चरित्रवान नागरिक बनें तो हमें सबसे पहले अपने घर के वातावरण को संस्कारों का विद्यालय बनाना होगा।
उन्होंने कहा कि बच्चों को हर सुविधा देने से पहले सही दिशा दें, हर जिद पूरी करने से पहले उसके परिणाम समझाएं और उन्हें उपदेश देने से पहले स्वयं वह आचरण करके दिखाएं। यही सच्ची परवरिश है। बच्चे हमारी बातें कम और हमारा जीवन अधिक देखते हैं। आज माता-पिता उनके सामने जैसा आदर्श प्रस्तुत करेंगे, कल वही आने वाली पीढ़ी के संस्कार और समाज की दिशा तय करेगा।















