स्थानांतरण नीति 2025 की उड़ी धज्जियां : पशुपालन विभाग में ‘अटैचमेंट राज’ श् कायम, छुरिया का वेतन दुर्ग में ‘ऐश’ कर रहीं डॉक्टर!

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राजनांदगांव। राज्य शासन की महत्वाकांक्षी स्थानांतरण नीति 2025 पशुधन विकास विभाग में महज कागजी साबित हो रही है। सामान्य प्रशासन विभाग के सख्त निर्देशों के बावजूद विभाग में ‘संलग्नीकरण का खेल’ खुलेआम जारी है, जिसका जीता-जागता उदाहरण विकासखंड छुरिया बना हुआ है।

मामला क्या है?
वर्ष 2022 में मध्यप्रदेश से प्रतिनियुक्ति पर आई पशु चिकित्सक डॉ. पूजा जोल्हे की पदस्थापना शासन के आदेशानुसार विकासखंड छुरिया, जिला राजनांदगांव में की गई थी। आरोप है कि पहले दिन से ही डॉ. जोल्हे को अटैच करके पशु प्रजनन प्रक्षेत्र अंजोरा, दुर्ग में ऑफि में पदस्थ कर दिया गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले 4 वर्षों से डॉ. जोल्हे का वेतन नियमित रूप से विकासखंड छुरिया के पद के विरुद्ध आहरित किया जा रहा है, जबकि वे दुर्ग में कार्यरत हैं। जानकारी मिली है कि डा. जोल्हे के पति पशु चिकितसा एवं महाविद्यालय अंजोरा, दुर्ग में प्रोफेसर है।

उप संचालक पर गंभीर आरोप
स्थानीय सूत्रों का दावा है कि उप संचालक पशु चिकित्सा सेवाएं राजनांदगांव डॉ. अनुप चटर्जी नियम विरुद्ध कार्य करने के लिए ‘प्रख्यात’ हैं। विभागीय गलियारों में चर्चा है कि इस ‘सुविधाजनक अटैचमेंट’ के एवज में प्रतिमाह मोटी रकम ली जा रही है।

छुरिया की जनता बेहाल
विकासखंड छुरिया में डॉ. जोल्हे के पद के अलावा पशु चिकित्सालय गेंदाटोला में भी पशु चिकित्सक का पद रिक्त है। दो-दो पद खाली होने से क्षेत्र के सैकड़ों गांवों में पशु चिकित्सा, टीकाकरण, नस्ल सुधार एवं विभागीय योजनाएं पूरी तरह ठप हैं। बेजुबान पशु इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे हैं।

सुशासन तिहार में फूटेगा गुस्सा
लगातार अनदेखी से आक्रोशित छुरिया क्षेत्र के ग्रामीण अब आर-पार के मूड में हैं। ग्रामीणों ने निर्णय लिया है कि आगामी सुशासन तिहार शिविर में सामूहिक रूप से पहुंचकर इस नियम विरुद्ध संलग्नीकरण की लिखित शिकायत दर्ज कराएंगे।

नीति क्या कहती है?
स्थानांतरण नीति 2025 के बिंदु क्रमांक 3.16 में स्पष्ट उल्लेख है कि स्थानांतरण आदेश जारी होने के 15 दिवस के भीतर संबंधित अधिकारी को एकतरफा कार्यमुक्त कर देना है, अन्यथा कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। वहीं बिंदु 3.17 के अनुसार 5 जून 2025 से समस्त संलग्नीकरण स्वतः समाप्त माने जाएंगे। बावजूद इसके पशुपालन विभाग में नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

सवाल शासन पर
यह पूरा प्रकरण साबित करता है कि ऊंची पहुंच हो तो नियम-कायदे मायने नहीं रखते। हैरानी की बात यह है कि शासन के उच्चाधिकारी या तो इस पूरे मामले से अनजान हैं या जानबूझकर आंखें मूंदे हुए हैं। अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री के ‘सुशासन’ के दावों के बीच पशुपालन विभाग में चल रहे इस ‘कुशासन’ पर शासन क्या सख्त कदम उठाता है? या फिर ‘अटैचमेट राज’ यूं ही चलता रहेगा?