शब-ए-कद्र की रात, इबादत का विशेष महत्व : हाजी रईस अहमद शकील

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राजनांदगांव। जामा मस्जिद मुस्लिम समाज के अध्यक्ष हाजी रईस अहमद शकील ने विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा कि रमजान के पवित्र महीने के आखिरी अशरे में आने वाली शब-ए-कद्र की रातों को इस्लाम में बेहद मुकद्दस और बरकतों वाली रात माना जाता है।
इन मुकद्दस मुबारक रातों में की गई इबादत का सवाब हजार महीनों की इबादत से भी ज्यादा अफजल है। इसलिए अकीदतमंद इन दिनों में विशेष रूप से नमाज, अस्तगफार, कुरआन पाक की तिलावत अपनी जिंदगी और आखरत, अपने मरहूमिन की मगफिरत के लिए दुआएं करते है, और पुरी रात अल्लाह के जिक्र और दुआ में मशगूल रहते हैं।
रईस अहमद शकील ने बताया कि रमजान शरीफ का छब्बीसवां रोजा मुक्कमल होने के बाद सत्ताईसवी शब में शब-ए-कद्र की रात होती है। इसी कारण अकीदतमंद इन सभी रातों में जागकर अल्लाह ताआला की इबादत करते हैं और अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं। साथ ही अपने मोहल्ले शहर देश में अमन चैन की दुआ करते है।
हाजी रईस अहमद शकील ने कहा कि इस बार शबे-कद्र अंग्रेजी की सोलह तारीख सोमवार (पीर) को आ रहा है, रमजान शरीफ में कुछ राते बड़ी महत्वपूर्ण बरकत वाली रातें मानी जाती हैं, जिनमें की गई दुआओं के कबूल होने की उम्मीद रहती है।
वहीं 27वीं शब को आमतौर पर सबसे ज्यादा अहम माना जाता है, अकीदतमंद इस रात बड़ी संख्या में मस्जिदों में इबादत करते हैं।
रईस अहमद ने कहा इस मुक्कदस महीने में मोमिनों को रमजान शरीफ की हर ताक (खास) रातों में शब, कद्र की तलाश करते हुए ही इबादत करना भी चाहिए।
रमजान की 21वीं रात से आखिरी अशरा शुरू होने के साथ ही एक खास अमल एतेकाफ भी शुरू हो जाता है, इसमें अकीदतमंद मस्जिदों में रहकर अल्लाह ताआला की इबादत करते हैं और दुनिया के कामों से अलग होकर अपना समय इबादत में गुजारते हैं।
हाजी रईस अहमद शकील ने हर साल की तरह तमाम उम्मते मुस्लमा से गुजारिश की है कि इस खास रातों की इबादतो में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें। माह-ए-रमजान के आखिरी शुक्रवार यानी अलविदा जुमा पर अकीदतमंदों की बड़ी तादाद में पूरे ख़ुशू-ओ-खुज़ू के साथ नमाज ए जुमा अदा की जाती हैं, इस मौके पर अतराफ के सभी मस्जिदों के इमाम साहब तमाम मुसलमानों को नमाज अदा कराते है और शहर से लेकर मुल्क भर के लिए दुआएँ की जाती है।
रोजा अफ्तार इसी तरह रमजान के पुरे महीने रोजादारों के लिए इफ्तार का आयोजन मस्जिद कमेटी और आवाम की तरफ से आयोजित किया जाता हैं, जिसमें सभी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते है और सैकड़ों रोजेदारों व अकीदतमंद एक साथ बैठकर इफ्तार करते हैं, मुल्क की तरक्की अमन-चैन व आपसी भाईचारे के लिए मांगी गई दुआ हमेशा से मोहब्बत, इंसानियत और भाईचारे का पैगाम देती हैं।
ऐसे ही धार्मिक आयोजन समाज को जोड़ने और दिलों को करीब लाने का काम करते हैं, साफ नीयत के साथ की गई ईबादत और खुली सोच के साथ लोगों से बर्ताव जहनी सुकून और हमारे ईमान को मजबूत करते हैं।
माह-ए-रमजान शरीफ का यह मुकद्दस महीना रहमत, मगफिरत और बरकतों का पैगाम लेकर आता है। दुआ है कि अल्लाह तआला हमारी तमाम इबादतों को कबूल फरमाए और हमारे मुल्क हिंदुस्तान में अमन वो सुकून कायम रहें और हम सबकी जिन्दगी को अपनी रहमतों से मालामाल करें।